दक्षिण भारत का एकजुट विरोध: परिसीमन को लेकर क्यों खड़े हुए गैर-बीजेपी राज्य?

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March 15, 2025

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भूमिका:
देश की राजनीति में एक नया मोड़ तब दिखाई दिया, जब केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने तमिलनाडु के सीएम एम.के. स्टालिन द्वारा 22 मार्च को चेन्नई में आयोजित “परिसीमन विरोधी” सम्मेलन को समर्थन देने की घोषणा की। यह सम्मेलन केंद्र सरकार के उस प्रस्ताव के खिलाफ है, जिसमें 2026 के बाद जनसंख्या आधारित परिसीमन कर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया जाएगा। केरल के शामिल होने के बाद यह आंदोलन दक्षिण भारत के राज्यों की एकजुटता और केंद्र के “एकतरफा फैसलों” के प्रति बढ़ते असंतोष का प्रतीक बन गया है। आइए समझते हैं कि परिसीमन क्या है और यह मुद्दा इतना विवादास्पद क्यों हो गया है।


परिसीमन: जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्बंटन

परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें जनसंख्या के अनुपात में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाएं तय की जाती हैं। उद्देश्य यह है कि हर निर्वाचन क्षेत्र में लगभग समान आबादी हो, ताकि “एक व्यक्ति, एक वोट” का सिद्धांत लागू हो सके। भारत में आखिरी बार 1971 की जनगणना के आधार पर परिसीमन हुआ था, और 2026 तक इसे स्थगित रखा गया है। 2026 के बाद नई जनगणना (संभवतः 2031) के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होगा।

चिंता की वजह:
दक्षिणी राज्यों को डर है कि उनकी जनसंख्या वृद्धि दर उत्तरी राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) से कम होने के कारण संसद में उनकी सीटें घट सकती हैं। उदाहरण के लिए:

  • तमिलनाडु की जनसंख्या वृद्धि दर (1971-2011): 15.6%
  • केरल: 56.7%
  • उत्तर प्रदेश: 110%
  • बिहार: 120%

इसका मतलब है कि नई सीटों का बंटवारा उत्तर के राज्यों के पक्ष में होगा, जिससे दक्षिण का राजनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है।


विरोध के चार बड़े कारण

1. जनसंख्या नियंत्रण की सजा?

दक्षिणी राज्यों ने परिवार नियोजन और सामाजिक विकास में उल्लेखनीय सफलता पाई है। केरल और तमिलनाडु में साक्षरता दर 90% के पास है, जबकि महिला सशक्तिकरण और स्वास्थ्य सेवाएं उत्तर के मुकाबले बेहतर हैं। लेकिन परिसीमन के नियमों के अनुसार, जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया, उन्हें संसद में कम सीटें मिलेंगी। तमिलनाडु के सांसद कनिमोझी ने इसे “अच्छे प्रदर्शन की सजा” बताया है।

दक्षिण भारत का एकजुट विरोध

2. संघवाद को खतरा

दक्षिणी नेताओं का आरोप है कि केंद्र ने बिना राज्यों से विचार-विमर्श किए परिसीमन की तैयारी शुरू कर दी है।

3. उत्तर बनाम दक्षिण का राजनीतिक असंतुलन

वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटों में से 225 (41%) उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों से हैं। परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 50% तक पहुँच सकती है, जबकि दक्षिऺण राज्यों की हिस्सेदारी घटेगी। इससे केंद्र की नीतियों पर उत्तर का दबदबा बढ़ेगा, जो दक्षिण के हितों के लिए चिंताजनक है।

4. आर्थिक नुकसान का डर

दक्षिणी राज्य देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 30% योगदान देते हैं और केंद्र को उत्तर के मुकाबले अधिक टैक्स चुकाते हैं। केरल और तमिलनाडु को डर है कि संसद में प्रतिनिधित्व घटने से उन्हें बजट आवंटन और परियोजनाओं में नुकसान होगा।


राजनीतिक एकजुटता: स्टालिन बन रहे ‘विपक्षी गठजोड़ के चेहरे’

एम.के. स्टालिन ने इस मुद्दे को गैर-बीजेपी दलों को एकजुट करने के लिए एक मंच के रूप में इस्तेमाल किया है। चेन्नई सम्मेलन में शामिल होने वालों में कांग्रेस, बीआरएस (तेलंगाना), बीजेडी (ओडिशा), और वाईएसआरसीपी (आंध्र) जैसे दल हैं, जो अक्सर एक-दूसरे के विरोधी रहे हैं। यहाँ तक कि नवीन पटनायक की बीजेडी, जो कभी एनडीए का हिस्सा थी, ने भी स्टालिन का समर्थन किया है।

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ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: परिसीमन विवाद नया नहीं

  • 1952 से 1971 तक, परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होता रहा। लेकिन 1976 में इंदिरा गांधी सरकार ने इसे 2001 तक स्थगित कर दिया, ताकि दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या नियंत्रण के लिए दंडित न किया जाए।
  • 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने इसे 2026 तक बढ़ा दिया। अब यह मुद्दा फिर से गरमा गया है।

विशेषज्ञों की राय:

  • चेन्नई के राजनीतिक विश्लेषक एस. मुरलीधरन कहते हैं, “परिसीमन से दक्षिण की 25-30 सीटें कम हो सकती हैं। यह क्षेत्रीय पहचान का संकट पैदा करेगा।”
  • दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के अनुसार, “यह विवाद भारत के संघीय ढांचे की परीक्षा है। केंद्र को राज्यों के साथ संवाद बढ़ाना होगा।”

निष्कर्ष: क्या यह ‘दक्षिण बनाम उत्तर’ की शुरुआत है?

परिसीमन विवाद ने भारत की राजनीति में एक नया अध्याय खोल दिया है। दक्षिणी राज्यों की एकजुटता इस बात का संकेत है कि वे केंद्र के “एकरंगी नीतियों” के खिलाफ खड़े होने को तैयार हैं। हालाँकि, इसे पूरी तरह से उत्तर-दक्षिण विभाजन के रूप में देखना सही नहीं होगा। ओडिशा और आंध्र जैसे राज्यों का समर्थन दर्शाता है कि यह संघवाद और न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व की लड़ाई है।

आने वाले समय में, इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज होगी। स्टालिन और विजयन जैसे नेता विपक्षी एकता को मजबूत करने की कोशिश करेंगे, जबकि केंद्र को संवेदनशीलता दिखाते हुए संवैधानिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता लानी होगी। यदि दोनों पक्ष समझौते का रास्ता नहीं ढूंढ़ते, तो यह विवाद भारतीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।

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